वन की भूमिका
वन की भूमिका
स्वस्थ पर्यावरण एवं पारिस्थितिक संतुलन के लिए समस्त भू-भाग का एक तिहाई वनों से ढका रहना चाहिए । भारत में वनाच्छादित क्षेत्रफल 748 लाख हेक्टेयर है, जो देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 27.7 प्रतिशत है । यह म्यांमार में 68 प्रतिशत, जापान में 62 प्रतिशत, स्वीडन में 55.5 प्रतिशत तथा संयुक्त राज्य अमेरिका में 33 प्रतिशत है, भारत के राज्यों में सर्वाधिक वन से आच्छादित अरूणाचल प्रदेश 87 प्रतिशत है । जबकि बिहार में 17 प्रतिशत राजस्थान में 4 प्रतिशत तथा हरियाणा एवं पंजाब में मात्र 2 प्रतिशत क्षेत्र पर वन हैं ।भारत में 93 प्रतिशत उष्ण कटिबंधीन वन तथा शेष 7 प्रतिशत शीतोष्ण वन हैं । उष्ण कटिबंधीय वनों में 50 प्रतिशत पर्णपाती अर्थात् पतझड़ वन हैं ।भारत में वनों का उत्पाद प्रतिवर्ष मात्र 0.5 घन मीटर प्रति हेक्टेयर है, जबकि विश्व का औसत उत्पादन 2.1 घन मीटर प्रति हेक्टेयर है ।
भारतीय वनों का वर्गीकरण भारत मानसूनी जलवायु का देश है । इसके बावजूद यहाँ अनेक प्रकार की प्राकृतिक वनस्पतियाँ पायी जाती हैं । वृहत अक्षांशीय विस्तार, तटीय फैलाव, वर्षा के वितरण की विषमता, उच्चावच, पर्वतीय विविधता तथा वनस्पतियों के प्रकार के कारण यहाँ वनों में व्यापक विषमता पाई जाती है ।

संयुक्त वन प्रबन्धन-एक अध्ययन
पहले से बिल्कुल हटकर अब 16 राज्यों में 15 हजार सामुदायिक समूह वन विभाग के साथ मिलकर 15 लाख हेक्टेयर वनों का प्रबन्ध देख रहे हैं। संयुक्त वन प्रबन्धन कार्यक्रम के तहत यह सम्भव हुआ है। इस कार्यक्रम को अक्सर लोकोन्मुख वन प्रबन्धन की ओर पहला कदम माना जाता है।
संयुक्त वन प्रबन्धन कार्यक्रम लागू होने के सात वर्ष बाद भी यह विशेष कारगर साबित नहीं हुआ है। राज्यों से मिल रहे संकेतों से यह पता चलता है कि यह कार्यक्रम भी अन्य सरकारी कार्यक्रमों की तरह केवल दस्तावेज बनकर रह गया है। सहभागिता और सतत विकास की अवधारणाओं पर आधारित होने के बावजूद कार्यक्रम के तहत लोगों को अपनी सम्पदा का खुद प्रबन्ध करने का कोई अधिकार मुश्किल से ही मिल पाया है। ऐसा मूल अवधारणा में किसी कमी की वजह से हुआ है या इसका क्रियान्वयन ठीक तरह से नहीं होने से, यह कहना मुश्किल है। क्या स्थिति में बदलाव आएगा? इस बारे में कार्यक्रम के समर्थकों का तर्क है कि यह तो एक प्रक्रिया की शुरुआत मात्र है और 150 वर्षों से चली आ रही प्रवृत्ति को बदलने में समय तो लगेगा ही। दूसरी ओर विरोधियों का कहना है कि ये तर्क आँखों में धूल झोंकने के समान है। उनका कहना है कि यह कार्यक्रम धन देने वाली अन्तरराष्ट्रीय एजेन्सी के दबाव में चलाया जा रहा है और इसका उद्देश्य फिर से जंगलों को हरा-भरा करने और उत्पादों को सस्ते मूल्य पर खरीदने के लिए चल रहे जनांदोलन का तोड़ना है।
इस लेख में संयुक्त वन प्रबन्धन की अवधारणा और उसके वास्तविक क्रियान्वयन का अध्ययन किया गया है और सम्बद्ध साहित्य के साथ-साथ यह नवम्बर, 1996 से मई, 1997 के बीच कर्नाटक और उड़ीसा में किए गए क्षेत्रीय अध्ययनों पर आधारित है।
संयुक्त वन प्रबन्धन कार्यक्रम, 1988 की राष्ट्रीय वन नीति पर आधारित है जिसमें जीविका के लिए गरीब ग्रामीणों के वन स्रोतों पर निर्भर रहने की बात साफतौर पर स्वीकार की गई है। इस नीति में वनभूमि के विकास और उसके संरक्षण में जन-सहभागिता के महत्व को स्वीकार किया गया है। पिछले 150 वर्षों से देश का लगभग 23 प्रतिशत भौगोलिक भाग (3290 लाख हेक्टेयर), जिसे वन भूमि माना जाता है, नियोजित और वैज्ञानिक वानिकी के बहाने सरकार के नियन्त्रण में है। इस दौरान ध्यान केवल इमारती लकड़ी के उत्पादन और जरूरतों के अनुरूप उसके शोषण पर ही रहा। वन भूमि पर उद्योगों की जरूरतों के अनुरूप पौधों की किस्में लगाने को बढ़ावा दिया गया। इसके लिए मिश्रित जाति के वनों का कटाव भी किया गया। 1947 में आजादी के बाद भी यह जारी रहा।
इससे वनों का ह्रास हुआ और ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी और बेरोजगारी बढ़ी। वन सम्पदा पर अधिकार के मुद्दे को लेकर और स्थानीय समुदाय को आजीविका के लिए लम्बे समय से चले आ रहे स्रोतों से अलग कर देने से सामाजिक संघर्ष बढ़ा। वनों का ह्रास बिना रुके जारी रहा और वनों पर आधारित उद्योगों के विकास से यह समस्या और बढ़ी। कृषि भूमि में कमी (वर्ष 1951 से 1980 के बीच) 2.623 मिलियन हेक्टेयर वन भूमि सरकारी तौर पर कृषि कार्य के लिए स्थानांतरित की गई। अनाधिकृत कब्जों, विकास गतिविधियों के लिए वन भूमि का प्रयोग और उद्योगों को वनों से कच्चा माल कम कीमत पर मिलते रहने से वनों के ह्रास में और तेजी आई। यह काम गरीब ग्रामीणों के हितों को ताक पर रखकर होता है। (अग्रवाल और सहगल, 1996: 1)।
वर्ष 1976 में वनों को संविधान की समवर्ती सूची में शामिल करके सरकार ने वनक्षेत्र में आ रही कमी को रोकने का प्रयास किया। इससे वनों और वन्य जीवन पर कानून बनाने का अधिकार केन्द्र सरकार के पास आ गया। वन संरक्षण की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम 1980 में वन संरक्षण अधिनियम बनाकर उठाया गया। इस अधिनियम से वनभूमि का प्रयोग गैर-वनीय कार्यों के लिए करने के पहले केन्द्र सरकार की अनुमति लेना जरूरी हो गया। इससे वन भूमि के गैर-वनीय प्रयोगों के लिए स्थानान्तरण पर कुछ हद तक रोक लगी लेकिन वनों का ह्रास जारी रहा। वर्ष 1980-85 के बीच हर वर्ष 47,300 हेक्टेयर वन समाप्त होते गए (अग्रवाल और सहगल, 1996)
वनों पर बढ़ते हुए दबाव को कम करने के लिए गैर-वनीय भूमि पर एक सामाजिक वानिकी कार्यक्रम शुरू किया गया। इसका उद्देश्य लोगों की आम जरूरतों को पूरा करना था लेकिन इससे वांछित परिणाम नहीं मिल पाए। सामाजिक वानिकी कार्यक्रम वन कर्मचारियों और वन उत्पादों का उपयोग करने वालों के बीच लम्बे समय से चल रहे संघर्ष को रोकने में असमर्थ रहा। कई वन अधिकारियों ने वन विभाग की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिन्ह लगाने शुरू कर दिए। अब उनकी समझ में आने लगा कि किसी भी वानिकी कार्यक्रम की सफलता के लिए लोगों की सहभागिता जरूरी है। (अग्रवाल और सहगल, 1996: 2)।
इस बीच यह सूचना मिलने लगी कि ग्रामीणों के कई समूह खुद आगे आकर अपने आसपास के वनों को संरक्षण दे रहे हैं। उड़ीसा, दक्षिण बिहार, मध्य प्रदेश और गुजरात में इस तरह के कई वन संरक्षक समूह हैं। पश्चिम बंगाल में तो कुछ दूरदर्शी अधिकारियों ने आस-पास के समुदायों को वन प्रबन्धन के कार्य में शामिल कर लिया। इसके परिणाम बहुत नाटकीय रहे।
इन्हीं सब सन्दर्भों में 1988 की राष्ट्रीय वन नीति तैयार की गई। इसमें पर्यावरण सम्बन्धी मुद्दों को प्राथमिकता देने और स्थानीय लोगों की जरूरतों को पूरा करने के साथ ही उनको वन प्रबन्धन में शामिल करने की बात कही गई। इस नीति के अनुसार वनों का उद्योगों के लिए व्यावसायिक शेषण नहीं किया जा सकता। भूमि एवं पर्यावरण संरक्षण के साथ ही स्थानीय लोगों की जरूरतों को पूरा करने को भी इसमें महत्त्वपूर्ण माना गया। इस वन नीति में राजस्व कमाने से अधिक प्राथमिकता पर्यावरण स्थिरता को दी गई (पैरा 2.2)। यह नीति एक ही किस्म के वनों की जगह मिश्रित श्रेणी के वनों को बढ़ावा देती है। इस नीति में व्यापार और निवेश के स्थान पर पारिस्थितिकी और लोगों की न्यूनतम जरूरतों जैसे ईंधन-चारा उपलब्ध कराने तथा जनजातीय लोगों के वनों से जुड़ाव पर ज्यादा जोर दिया गया (सक्सेना 1995: 13)।
नई नीति के पैरा 4.3 में कहा गया है कि जंगलों के नजदीक रहने वाले जनजातीय और गरीब लोगों का जीवन वनों पर ही आधारित होता है अतः उनके अधिकारों और हितों की रक्षा करनी चाहिए। चारे, ईंधन, वन उत्पाद और इमारती लकड़ी में उनका पहला हक होना चाहिए। इस सबके बावजूद इन उद्देश्यों को हासिल करने के लिए कोई ठोस पहल नहीं की गई।
नीति का क्रियान्वयन
आखिरकार 1988 की वन नीति जून, 1990 में पर्यावरण वन मन्त्रालय द्वारा संयुक्त वन प्रबन्धन अवधारणा की घोषणा के बाद सही मायनों में क्रियान्वित हुई। यह अवधारणा पश्चिम बंगाल में संयुक्त वन प्रबन्धन के सफल अनुभवों पर आधारित थी। इसके अनुसार वनों को फिर से हरा-भरा बनाने के लिए काम कर रहे ग्रामीण संगठनों को निर्धारित वन क्षेत्र से होने वाली आय में हिस्सा दिया जाना चाहिए। (एम ओ ई एफ 1990, पैरा 4, 5)। योजना के अन्तर्गत लाभार्थियों के अधिकारों और कर्तव्यों के बारे में एक समझौता ज्ञापन तैयार किया जाना चाहिए और उस पर उनकी और राज्य सरकार दोनों की सहमति ली जानी चाहिए (एमओइएफ,1990 पैरा 1, 7, 14)। इसके अलावा 1990 में सरकार द्वारा जारी परिपत्र में विशेष तौर पर कहा गया है कि ह्रास होती वन भूमि के संरक्षण और बचाव के लिए गैर-सरकारी संगठनों की अर्थपूर्ण सहभागिता ली जानी चाहिए क्योंकि समुदाय को संगठित करने में उन्हें दक्षता हासिल होती है (पैरा 3)। लेकिन परिपत्र में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि ग्रामीण संगठनों को तैयार करना किसकी जिम्मेदारी होगी और न ही इसमें इन संगठनों के वन प्रबन्धन में भाग लेने सम्बन्धी किसी अधिकार की चर्चा है।
राष्ट्रीय नीति के सुझाव लचीले हैं और इस बात की जरूरत ह कि राज्य भी इसके समानान्तर वन नीति तैयार करें और उसे खुद लागू करें। संयुक्त वन प्रबन्धन कार्यक्रम देश भर के 16 राज्यों में लागू किया गया है। केवल केरल और उत्तर-पूर्व के राज्यों में यह नहीं चल रहा है। ऐसा लगता है कि केरल भी अब इस कार्यक्रम पर कार्य कर रहा है। उत्तर-पूर्व में ज्यादातर जंगलों पर स्थानीय समुदाय का स्वामित्व है लेकिन देश के दूसरे भागों की तरह वहाँ संयुक्त वन कार्यक्रम अपने मौजूदा रूप में लागू नहीं किया जा सकता है। त्रिपुरा ने तो अपने अलग संयुक्त वन प्रबन्धन कार्यक्रम की घोषणा की है। मेघालय और अरुणाचल प्रदेश में भी इसी दिशा में महत्त्वपूर्ण प्रगति की खबर है।
वनों की किस्म और सामाजिक-आर्थिक आँकड़े राज्यवार अलग-अलग हैं। इसलिए संयुक्त वन कार्यक्रम भी राज्यवार सहभागिता के लिए समूहों के चुनाव (सोसायटी, कोऑपरेटिव या पंजीकृत अन्य संगठन) और उनको दिए जाने वाले अधिकारों को लेकर कुछ अलग-अलग हैं। इसके बावजूद सबका उद्देश्य एक ही है। सभी राज्यों द्वारा जारी आदेश के पहले भाग में नष्ट होती हुई वन-भूमि को फिर से हरा-भरा बनाने और उसके विकास में सामुदायिक सहभागिता की बात पर बल दिया गया है। उड़ीसा सरकार द्वारा जारी आदेश में इससे भी एक कदम आगे जाकर वन प्रबन्धन को पूरी तरह लोगों को सौंपने तथा वन विभाग और लोगों के बीच समान भागीदारी वाला कार्यक्रम बनाने की बात कहीं गई है।
अवधारणा में बदलाव
संयुक्त वन प्रबन्धन को वन विभाग के बाहर से भी पर्याप्त समर्थन मिला है क्योंकि राजनीतिक रूप से भी यह एक उचित कदम है और इससे आम लोग प्रबन्धन की मुख्य धारा में शामिल हो जाते हैं। यह कार्यक्रम वनों को फिर से तैयार करने के तरीके में मौलिक परिवर्तन की बात करता है और वास्तव में यह एक आन्दोलन की तरह है। इस अवधारणा में जो बदलाव आए हैं उन्हें संलग्न सारणी में दर्शाया गया है:पहले से बिल्कुल हटकर अब 16 राज्यों में 15 हजार सामुदायिक समूह वन विभाग के साथ मिलकर 15 लाख हेक्टेयर वनों का प्रबन्ध देख रहे हैं। संयुक्त वन प्रबन्धन कार्यक्रम के तहत यह सम्भव हुआ है। इस कार्यक्रम को अक्सर लोकोन्मुख वन प्रबन्धन की ओर पहला कदम माना जाता है।
संयुक्त वन प्रबन्धन कार्यक्रम लागू होने के सात वर्ष बाद भी यह विशेष कारगर साबित नहीं हुआ है। राज्यों से मिल रहे संकेतों से यह पता चलता है कि यह कार्यक्रम भी अन्य सरकारी कार्यक्रमों की तरह केवल दस्तावेज बनकर रह गया है। सहभागिता और सतत विकास की अवधारणाओं पर आधारित होने के बावजूद कार्यक्रम के तहत लोगों को अपनी सम्पदा का खुद प्रबन्ध करने का कोई अधिकार मुश्किल से ही मिल पाया है। ऐसा मूल अवधारणा में किसी कमी की वजह से हुआ है या इसका क्रियान्वयन ठीक तरह से नहीं होने से, यह कहना मुश्किल है। क्या स्थिति में बदलाव आएगा? इस बारे में कार्यक्रम के समर्थकों का तर्क है कि यह तो एक प्रक्रिया की शुरुआत मात्र है और 150 वर्षों से चली आ रही प्रवृत्ति को बदलने में समय तो लगेगा ही। दूसरी ओर विरोधियों का कहना है कि ये तर्क आँखों में धूल झोंकने के समान है। उनका कहना है कि यह कार्यक्रम धन देने वाली अन्तरराष्ट्रीय एजेन्सी के दबाव में चलाया जा रहा है और इसका उद्देश्य फिर से जंगलों को हरा-भरा करने और उत्पादों को सस्ते मूल्य पर खरीदने के लिए चल रहे जनांदोलन का तोड़ना है।
इस लेख में संयुक्त वन प्रबन्धन की अवधारणा और उसके वास्तविक क्रियान्वयन का अध्ययन किया गया है और सम्बद्ध साहित्य के साथ-साथ यह नवम्बर, 1996 से मई, 1997 के बीच कर्नाटक और उड़ीसा में किए गए क्षेत्रीय अध्ययनों पर आधारित है।
संयुक्त वन प्रबन्धन कार्यक्रम, 1988 की राष्ट्रीय वन नीति पर आधारित है जिसमें जीविका के लिए गरीब ग्रामीणों के वन स्रोतों पर निर्भर रहने की बात साफतौर पर स्वीकार की गई है। इस नीति में वनभूमि के विकास और उसके संरक्षण में जन-सहभागिता के महत्व को स्वीकार किया गया है। पिछले 150 वर्षों से देश का लगभग 23 प्रतिशत भौगोलिक भाग (3290 लाख हेक्टेयर), जिसे वन भूमि माना जाता है, नियोजित और वैज्ञानिक वानिकी के बहाने सरकार के नियन्त्रण में है। इस दौरान ध्यान केवल इमारती लकड़ी के उत्पादन और जरूरतों के अनुरूप उसके शोषण पर ही रहा। वन भूमि पर उद्योगों की जरूरतों के अनुरूप पौधों की किस्में लगाने को बढ़ावा दिया गया। इसके लिए मिश्रित जाति के वनों का कटाव भी किया गया। 1947 में आजादी के बाद भी यह जारी रहा।
इससे वनों का ह्रास हुआ और ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी और बेरोजगारी बढ़ी। वन सम्पदा पर अधिकार के मुद्दे को लेकर और स्थानीय समुदाय को आजीविका के लिए लम्बे समय से चले आ रहे स्रोतों से अलग कर देने से सामाजिक संघर्ष बढ़ा। वनों का ह्रास बिना रुके जारी रहा और वनों पर आधारित उद्योगों के विकास से यह समस्या और बढ़ी। कृषि भूमि में कमी (वर्ष 1951 से 1980 के बीच) 2.623 मिलियन हेक्टेयर वन भूमि सरकारी तौर पर कृषि कार्य के लिए स्थानांतरित की गई। अनाधिकृत कब्जों, विकास गतिविधियों के लिए वन भूमि का प्रयोग और उद्योगों को वनों से कच्चा माल कम कीमत पर मिलते रहने से वनों के ह्रास में और तेजी आई। यह काम गरीब ग्रामीणों के हितों को ताक पर रखकर होता है। (अग्रवाल और सहगल, 1996: 1)।
वर्ष 1976 में वनों को संविधान की समवर्ती सूची में शामिल करके सरकार ने वनक्षेत्र में आ रही कमी को रोकने का प्रयास किया। इससे वनों और वन्य जीवन पर कानून बनाने का अधिकार केन्द्र सरकार के पास आ गया। वन संरक्षण की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम 1980 में वन संरक्षण अधिनियम बनाकर उठाया गया। इस अधिनियम से वनभूमि का प्रयोग गैर-वनीय कार्यों के लिए करने के पहले केन्द्र सरकार की अनुमति लेना जरूरी हो गया। इससे वन भूमि के गैर-वनीय प्रयोगों के लिए स्थानान्तरण पर कुछ हद तक रोक लगी लेकिन वनों का ह्रास जारी रहा। वर्ष 1980-85 के बीच हर वर्ष 47,300 हेक्टेयर वन समाप्त होते गए (अग्रवाल और सहगल, 1996)
वनों पर बढ़ते हुए दबाव को कम करने के लिए गैर-वनीय भूमि पर एक सामाजिक वानिकी कार्यक्रम शुरू किया गया। इसका उद्देश्य लोगों की आम जरूरतों को पूरा करना था लेकिन इससे वांछित परिणाम नहीं मिल पाए। सामाजिक वानिकी कार्यक्रम वन कर्मचारियों और वन उत्पादों का उपयोग करने वालों के बीच लम्बे समय से चल रहे संघर्ष को रोकने में असमर्थ रहा। कई वन अधिकारियों ने वन विभाग की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिन्ह लगाने शुरू कर दिए। अब उनकी समझ में आने लगा कि किसी भी वानिकी कार्यक्रम की सफलता के लिए लोगों की सहभागिता जरूरी है। (अग्रवाल और सहगल, 1996: 2)।
इस बीच यह सूचना मिलने लगी कि ग्रामीणों के कई समूह खुद आगे आकर अपने आसपास के वनों को संरक्षण दे रहे हैं। उड़ीसा, दक्षिण बिहार, मध्य प्रदेश और गुजरात में इस तरह के कई वन संरक्षक समूह हैं। पश्चिम बंगाल में तो कुछ दूरदर्शी अधिकारियों ने आस-पास के समुदायों को वन प्रबन्धन के कार्य में शामिल कर लिया। इसके परिणाम बहुत नाटकीय रहे।
इन्हीं सब सन्दर्भों में 1988 की राष्ट्रीय वन नीति तैयार की गई। इसमें पर्यावरण सम्बन्धी मुद्दों को प्राथमिकता देने और स्थानीय लोगों की जरूरतों को पूरा करने के साथ ही उनको वन प्रबन्धन में शामिल करने की बात कही गई। इस नीति के अनुसार वनों का उद्योगों के लिए व्यावसायिक शेषण नहीं किया जा सकता। भूमि एवं पर्यावरण संरक्षण के साथ ही स्थानीय लोगों की जरूरतों को पूरा करने को भी इसमें महत्त्वपूर्ण माना गया। इस वन नीति में राजस्व कमाने से अधिक प्राथमिकता पर्यावरण स्थिरता को दी गई (पैरा 2.2)। यह नीति एक ही किस्म के वनों की जगह मिश्रित श्रेणी के वनों को बढ़ावा देती है। इस नीति में व्यापार और निवेश के स्थान पर पारिस्थितिकी और लोगों की न्यूनतम जरूरतों जैसे ईंधन-चारा उपलब्ध कराने तथा जनजातीय लोगों के वनों से जुड़ाव पर ज्यादा जोर दिया गया (सक्सेना 1995: 13)।
नई नीति के पैरा 4.3 में कहा गया है कि जंगलों के नजदीक रहने वाले जनजातीय और गरीब लोगों का जीवन वनों पर ही आधारित होता है अतः उनके अधिकारों और हितों की रक्षा करनी चाहिए। चारे, ईंधन, वन उत्पाद और इमारती लकड़ी में उनका पहला हक होना चाहिए। इस सबके बावजूद इन उद्देश्यों को हासिल करने के लिए कोई ठोस पहल नहीं की गई।
नीति का क्रियान्वयन
आखिरकार 1988 की वन नीति जून, 1990 में पर्यावरण वन मन्त्रालय द्वारा संयुक्त वन प्रबन्धन अवधारणा की घोषणा के बाद सही मायनों में क्रियान्वित हुई। यह अवधारणा पश्चिम बंगाल में संयुक्त वन प्रबन्धन के सफल अनुभवों पर आधारित थी। इसके अनुसार वनों को फिर से हरा-भरा बनाने के लिए काम कर रहे ग्रामीण संगठनों को निर्धारित वन क्षेत्र से होने वाली आय में हिस्सा दिया जाना चाहिए। (एम ओ ई एफ 1990, पैरा 4, 5)। योजना के अन्तर्गत लाभार्थियों के अधिकारों और कर्तव्यों के बारे में एक समझौता ज्ञापन तैयार किया जाना चाहिए और उस पर उनकी और राज्य सरकार दोनों की सहमति ली जानी चाहिए (एमओइएफ,1990 पैरा 1, 7, 14)। इसके अलावा 1990 में सरकार द्वारा जारी परिपत्र में विशेष तौर पर कहा गया है कि ह्रास होती वन भूमि के संरक्षण और बचाव के लिए गैर-सरकारी संगठनों की अर्थपूर्ण सहभागिता ली जानी चाहिए क्योंकि समुदाय को संगठित करने में उन्हें दक्षता हासिल होती है (पैरा 3)। लेकिन परिपत्र में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि ग्रामीण संगठनों को तैयार करना किसकी जिम्मेदारी होगी और न ही इसमें इन संगठनों के वन प्रबन्धन में भाग लेने सम्बन्धी किसी अधिकार की चर्चा है।
राष्ट्रीय नीति के सुझाव लचीले हैं और इस बात की जरूरत ह कि राज्य भी इसके समानान्तर वन नीति तैयार करें और उसे खुद लागू करें। संयुक्त वन प्रबन्धन कार्यक्रम देश भर के 16 राज्यों में लागू किया गया है। केवल केरल और उत्तर-पूर्व के राज्यों में यह नहीं चल रहा है। ऐसा लगता है कि केरल भी अब इस कार्यक्रम पर कार्य कर रहा है। उत्तर-पूर्व में ज्यादातर जंगलों पर स्थानीय समुदाय का स्वामित्व है लेकिन देश के दूसरे भागों की तरह वहाँ संयुक्त वन कार्यक्रम अपने मौजूदा रूप में लागू नहीं किया जा सकता है। त्रिपुरा ने तो अपने अलग संयुक्त वन प्रबन्धन कार्यक्रम की घोषणा की है। मेघालय और अरुणाचल प्रदेश में भी इसी दिशा में महत्त्वपूर्ण प्रगति की खबर है।
वनों की किस्म और सामाजिक-आर्थिक आँकड़े राज्यवार अलग-अलग हैं। इसलिए संयुक्त वन कार्यक्रम भी राज्यवार सहभागिता के लिए समूहों के चुनाव (सोसायटी, कोऑपरेटिव या पंजीकृत अन्य संगठन) और उनको दिए जाने वाले अधिकारों को लेकर कुछ अलग-अलग हैं। इसके बावजूद सबका उद्देश्य एक ही है। सभी राज्यों द्वारा जारी आदेश के पहले भाग में नष्ट होती हुई वन-भूमि को फिर से हरा-भरा बनाने और उसके विकास में सामुदायिक सहभागिता की बात पर बल दिया गया है। उड़ीसा सरकार द्वारा जारी आदेश में इससे भी एक कदम आगे जाकर वन प्रबन्धन को पूरी तरह लोगों को सौंपने तथा वन विभाग और लोगों के बीच समान भागीदारी वाला कार्यक्रम बनाने की बात कहीं गई है।
अवधारणा में बदलाव
संयुक्त वन प्रबन्धन को वन विभाग के बाहर से भी पर्याप्त समर्थन मिला है क्योंकि राजनीतिक रूप से भी यह एक उचित कदम है और इससे आम लोग प्रबन्धन की मुख्य धारा में शामिल हो जाते हैं। यह कार्यक्रम वनों को फिर से तैयार करने के तरीके में मौलिक परिवर्तन की बात करता है और वास्तव में यह एक आन्दोलन की तरह है। इस अवधारणा में जो बदलाव आए हैं उन्हें संलग्न सारणी में दर्शाया गया है:
संयुक्त वन प्रबन्धन की अवधारणा और उसके वास्तविक क्रियान्वयन की समीक्षा करते हुए लेखक का कहना है कि इस कार्यक्रम में प्राथमिक महत्व उन लोगों को दिया जाना चाहिए जो निर्णय लेने की स्थिति में हैं, न कि वन विभाग को। इसके स्पष्ट प्रमाण उपलब्ध हैं कि आवश्यकता पड़ने पर ग्रामीण समूहों ने इस क्षेत्र में अपनी क्षमता दिखाई है। लेखक के अनुसार कुछ समय बाद वन विभाग की भूमिका केवल सलाहकार और सहायक एजेन्सी तक सीमित रह जाएगी।
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